Wednesday, 3 August 2016

रूडा़ राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे।

शीश बोरलो नासा मे नथड़ी सौगड़ सोनो सेर कठे ,
कठे पौमचो मरवण को बोहतर कळिया को घेर कठे,!
कठे पदमणी पूंगळ की ढोलो जैसलमैर कठै,
कठे चून्दड़ी जयपुर की साफौ सांगानेर कठे !
गिणता गिणता रेखा घिसगी पीव मिलन की रीस कठे,
ओठिड़ा सू ठगियौड़़ी बी पणिहारी की टीस कठे!
विरहण रातों तारा गिणती सावण आवण कौल कठे,
सपने में भी साजन दीसे सास बहू का बोल कठे!
छैल भवंरजी ढौला मारू कुरजा़ मूमल गीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे!!

हरी चून्दड़ी तारा जड़िया मरूधर धर की छटा कठे,
धौरा धरती रूप सौवणौ काळी कळायण घटा कठे!
राखी पुनम रैशम धागे भाई बहन को हेत कठे,
मौठ बाज़रा सू लदीयौड़ा आसौजा का खैत कठे!
आधी रात तक होती हथाई माघ पौष का शीत कठे,
सुख दःख में सब साथ रेवता बा मिनखा की प्रीत कठे!
जन्मया पैला होती सगाई बा वचना की परतीत कठे,
गाँव गौरवे गाया बैठी दूध दही नौनीत कठे!
दादा को करजौ पोतों झैले बा मिनखा की नीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे!!

जाज़म बैठ्या मूँछ मरौड़े अमला की मनवार कठे,
दोगज ने जो फिरतो रैतों भूखों गाजणहार कठे!
काळ पड़ीया कौठार खौलता दानी साहूकार कठे,
सड़का ऊपर लाडू गुड़ता गैण्डा की बै हुणकार कठे!
पतिया सागे सुरग जावती बै सतवन्ती नार कठे,
लखी बणजारो टांडौ ढाळै बाळद को वैपार कठे!
धरा धरम पर आँच आवता मर मिटनै की हौड़ कठे,
फैरा सू अधबिच में उठियौं बो पाबू राठौड़ कठे!
गळियौं में गिरधर ने गावैं बी मीरा का गीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे!!

बितौड़ा वैभव याद दिलवै रणथम्बौर चितौड़ जठे,
राणा कुमभा को विजय स्तम्भ बलि राणा को मौड़ जठे!
हल्दिघाटी में घूमर घालै चैतक चढ्यों राण जठे,
छत्र छँवर छन्गीर झपटियौ बौ झालौ मकवाण कठे!
राणी पदमणी के सागै ही कर सौलह सिणगार जठे,
सजधज सतीया सुरग जावती मन्त्रा मरण त्यौहार कठे!
जयमल पता गौरा बादल रैखड़का की तान कठे,
बिन माथा धड़ लड़ता रैती बा रजपूती शान कठे!
तैज केसरिया पिया कसमा साका सुरगा प्रीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे!!

निरमौही चित्तौड़ बतावै तीनों सागा साज कठे,
बौहतर बन्द किवाँड़ बतावै ढाई साका आज कठे!
चित्तौड़ दुर्ग को पेलौ पैहरी रावत बागौ बता कठे,
राजकँवर को बानौ पैरया पन्नाधाय को गीगो कठे!
बरछी भाला ढाल कटारी तोप तमाशा छैल कठे,
ऊंटा लै गढ़ में बड़ता चण्डा शक्ता का खैल कठे!
जैता गौपा सुजा चूण्डा चन्द्रसेन सा वीर कठे,
हड़बू पाबू रामदेव सा कळजुग में बै पीर कठे!
कठे गयौ बौ दुरगौ बाबौ श्याम धरम सू प्रीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे!

हाथी को माथौं छाती झाले बै शक्तावत आज कठे,
दौ दौ मौतों मरबा वाळौ बल्लू चम्पावत आज कठे!
खिलजी ने सबक सिखावण वाळौ सोनगिरौं विरमदैव कठे,
हाथी का झटका करवा वाळौ कल्लो राई मलौत कठे!
अमर कठे हमीर कठे पृथ्वीराज चौहान कठे,
समदर खाण्डौ धोवण वाळौ बौ मर्दानौं मान कठे!
मौड़ बन्धियोड़ौ सुरजन जुन्झै जग जुन्झण जुन्झार कठे,
ऊदिया राणा सू हौड़ करणियौ बौ टौडर दातार कठे!
जयपुर शहर बसावण वाळा जयसिंह जी सी रणनीत कठे,
रूड़ा राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे !!
रूडा़ राजस्थान बता वा थारी रूड़ी रीत कठे।

Tuesday, 2 August 2016

गहणा गांठा गजब रा 

गहणां गांठा गजब रा  जीवां  बड़ो जतन्न
मिनखां सूं मोळा घणा मिनकी माथै मन्न

मरतो भूखो मानखो औदर मिले न अन्न
दुनियादारी दोगली मिनकी माथै मन्न

पुरसारथ रे पांण तो दोरो ढकणो तन्न
अनीति आमद करै जद मिनकी माथै मन्न

मिनकी मुख फेरे नहीं कितरा करो कळाप
अे सी बी ने ओळबा  परो मिटावो पाप

मिनखां से मिनकां बड़ा  भला सराया भाग
जुर जुर जीवै जूण ने  करमां बोले काग

मिनकी बड़ी महान .मेंबरशिप माडे थन्ने
नहीं टिकट नादान निर्दल थन्ने  जीतावस्यां ...

रतन सिंह चंपावत

Saturday, 30 July 2016

थाकी बैठी आज डोकरी।


थाकी बैठी आज डोकरी।
राखी घर री लाज डोकरी।।
वडकां बांधी,भुजबल पोखी।
काण कायदै पाज डोकरी।।
कदै नवेली दुलहण आंगण।
होती ही सिरताज डोकरी।।
कदै रूप भंमराता भंमरा।
पिव रो होती नाज डोकरी।।
सावण सुरंगी तीज लागती
भादरवै री गाज डोकरी।।
खाणो,पीणो,गाणो, रंजण।
इकडंकियो घर राज डोकरी।।
राजा राणी कितरी काणी।
हरजस वाणी साज डोकरी।।
साजै- मांदै आंणै- टांणै।
सबरै हाजर भाज डोकरी।।
समै देख फसवाड़ो फोर्यो।
खुद घर झेलै दाझ डोकरी।।
खुन पसीनो पायर पोस्या।
वां कीनी बेताज डोकरी।।
बहुवां देख सिकोतर आई।
बेटा बणिया बाज डोकरी।।
हाथ माथै नैं दे पिसतावै।
कर अपणो अक्काज डोकरी।।
सब रा ओगण देख विसारै।
क्षमा भर्योड़ी जाझ डोकरी।।
गिरधरदान रतनू दासोड़ी

Friday, 29 July 2016

घंटा

एक बार एक जाट ताऊ प्लेन से
लन्दन जा रहा था,
बगल में एक अंग्रेज बैठा हुआ था !
--
जाट ने अंग्रेज से पूछा - "आप क्या करते हो ?
अंग्रेज - मैं एक साईंटिस्ट हूँ... और आप ?
जाट - मैं मास्टर हूँ !
--
अंग्रेज - "WoW teacher क्या हम किसी टॉपिक पर बात कर सकते हैं ?"
जाट - "बिलकुल ,
--
अंग्रेज - "अच्छा, तुम मुझे न्यूक्लियर पावर के बारे में कुछ बताओ ?
--
जाट ये सुनकर चुप रह गया !
--
अंग्रेज - (व्यंग से) "ओह ~ तो तुम नहीं जानते ?"
जाट - "जानता तो हूँ लेकिन तु पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो"
अंग्रेज - "hmmm~ पूछो .?
--
जाट - "मंदिर में भी घंटा होता है और चर्च में भी घंटा होता है, तो फिर
चर्च का घंटा मंदिर के घंटे से बड़ा क्यों होता है ?
अंग्रेज कुछ देर सोचता
रहा फिर बोला - "मैं नहीं जानता"
जाट ने एक दिया खीच के कान के निचे और बोला "अबे साले .. पता तनै घंटे का भी ना है और
बात न्यूक्लियर पावर की करै है !!

Monday, 4 July 2016

घंटा

एक बार एक जाट ताऊ प्लेन से
लन्दन जा रहा था,
बगल में एक अंग्रेज बैठा हुआ था !
--
जाट ने अंग्रेज से पूछा - "आप क्या करते हो ?
अंग्रेज - मैं एक साईंटिस्ट हूँ... और आप ?
जाट - मैं मास्टर हूँ !
--
अंग्रेज - "WoW teacher क्या हम किसी टॉपिक पर बात कर सकते हैं ?"
जाट - "बिलकुल ,
--
अंग्रेज - "अच्छा, तुम मुझे न्यूक्लियर पावर के बारे में कुछ बताओ ?
--
जाट ये सुनकर चुप रह गया !
--
अंग्रेज - (व्यंग से) "ओह ~ तो तुम नहीं जानते ?"
जाट - "जानता तो हूँ लेकिन तु पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो"
अंग्रेज - "hmmm~ पूछो .?
--
जाट - "मंदिर में भी घंटा होता है और चर्च में भी घंटा होता है, तो फिर
चर्च का घंटा मंदिर के घंटे से बड़ा क्यों होता है ?
अंग्रेज कुछ देर सोचता
रहा फिर बोला - "मैं नहीं जानता"
जाट ने एक दिया खीच के कान के निचे और बोला "अबे साले .. पता तनै घंटे का भी ना है और
बात न्यूक्लियर पावर की करै है !!

Thursday, 30 June 2016

होपोरे कुन आवी

एक कड़वा सच

शादी में कुवारे
और शवयात्रा में बूढ़े
लोग ज्यादा इस वजह से जाते हे की दोनों को एक बात ही सताती हे

होपे नी जाइयो तो होपोरे कुन आवी

छगनजी

मारवाड़ में आधार कार्ड बन रहे थे तो एक लुगाई से अधिकारी ने पुछा की तुमारे घरवाले का नाम क्या है ........
..
.
लुगाई बोली हमारे उनका नाम नहीं लेते...
.....
अधिकारी::::::कोई हिंट तो दो:::::::::

लुगाई (3 गंजी + 3 गंजी)
......

अधिकारी बोला क्या ....
......??

तभी बाजु में बुड्ढा बोला
...........
साब "छगनजी"

Wednesday, 15 June 2016

धरम धरा सूं लोप हुयो,


धरम धरा सूं लोप हुयो, मिनखां रा माङा हाल हुया।
खांडा हाथां सूं खिसक गया, दारू रा प्याला माल हुया।
सिंघा री हाथल़ झेलणियां, अब श्वाना रा रखवाल़ हुया।
कहो छायण अब क्या गाऊं, रजपूत भाई कलाल़ हुया।।

बै बात सटै सिर दे देता, अै नोट सटै सिर काटै है।
धन रा लोभी मतहीणां, अब थूक थूक'नै चाटै है।
हथल़ेवो छोङ'न बी'र हुयो, बो पाबू कोल निभावण नै।
अब बता किस्यै मैं है बाकी, रजपूती बैठूं गावण नै।।

इला न देता जीव थकां, मर ज्याता मायङ मान सटै।
फिरता बन बन राम बण्या, बता बिस्या रजपूत कठै।
अब तो लाडी अर गाडी ह्वै, भोम भलां ही जाती रै।
बता मनै तूं छायण अब, आ जीभ किणां बिध गाती रै।।

गरब घणेरो जिण पर करता, बो रजपूती अभिमान गयो।
खाली डील मरोङै है, बो कुल़ रो स्वाभिमान गयो।
कुल़ जात धरम सब छोङ भया, पिच्छम रा अै दीवाणा।
अब छायण तूं ही बतल़ा, किण बिध उकलै बै गाणा।।

बा रजपूती म्याना मैं सो गी, धेन धरा रूखाल़ी ही।
द्विज पद-रज री खातिर, बा रैती घणी उताल़ी ही।
अब धेन धरा तो बेच दयी, द्विज रो मान सम्मान गयो।
किण बिध गाऊं मैं रजपूती, सूनो सो हिवङो डोल रह्यो।।

बाजी कै लुल़ता पाय पकङ, दे कांधो पालकी छुङवाता।
बाजी कहदी बात नकी, पाछी कदे नीं फिरवाता।
बाजी री पहुंच रणवासां तक, महलां मांय भरोसो हो।
पिता-पुत्री ज्यां मेल़ घणां, अर रिश्तो बडो खरो सो हो।।

बो निजपण गयो, निज मेल़ नहीं, हेत खूंटग्यो हिवङां मैं।
बो साख सनातन नहीं रह्यो, अब नेह नहीं है जिवङां मैं।
तो बाजी भी पाजी बण बैठ्या, अर रजपूती मैं डोल़ नहीं।
चारण कहै साची अब छायण, इण जग मैं सांच रो मोल नहीं।।

- मनोज चारण (गाडण) "कुमार" कृत

Tuesday, 14 June 2016

गरविलो गढ़ जाळोर

!! गरविलो गढ़ जाळोर !!

सोराष्ट्र परदेश शिवालय सोमनाथ कहावे,
चढ़ आई मुगलीया फौज जबर जद लूट मचावे !

सोमनाथ नें लूट मुगल हद हाहाकार मचावे,
शिवलिंग नें उखाङ तुरकङा संग ले जावे !

गढ़ पूग्या जाळोर कांकङ में जद डेरा लगावे,
गुप्तचर दौङ्या आय कान्हङ ने खबर सुणावे !

कर घोर घमसाण कान्हङ शिवलिंग छुङावे,
सिंग सी करी दहाङ मुगलां नें मार भगावे !

शुभ चौघङीयो देख कान्हङदे यूं फरमावे,
"सरना" सूरां री धरा शिवलिंग थापन करवावे !

वीरमदेव सो वीर कान्हङ को पूत कहलावे,
रणखेतां रे माय मुगलां में हाहाकार मचावे !

सूरापूरा री बातां खिलजी रे जद काना जावे,
खिलजी मन खुश होय वीरम नें दिल्ली बुलावे !

कर मनमें कळाप कान्हङदे सिरदारां ने बतावे,
ले कान्हङ आशिष विरमदे दिल्ली सिदावे !

करी खातरी जोर खिलजी मनमें हरषावे,
हद हूर रो रूप फिरोजां धिवङ कहलावे !

विरमदेव रे संग निकाह उणरो करणी चावे,
विरम मन हुयो उदास मुगल सूं छळीयो जावे !

करी समझ री बात बरात लावण रो केवे,
गढ़ पूग्यो जाळोर तुरक नें तुरन्त बतावे !

हिन्दवाणी सूरां रो गरब तूं गाळ नहीं पावे,
होय हिन्दु तुरकणी परणुं कुळ चव्हाण  लजावे !

दोहा:- मांमो लाजे भाटीयां,
                   कुळ लाजे चव्हाण,
जे हूं परणु तुरकणी,
                   जद पिछम उगे भाण !

ओ अपमान रो घूंट खिलजी भर नहीं पावे,
जद चढ्यो फौजा लेय जाळोर रोंदण नें आवे !

सिवाणा सिरदार सातळदेव नाम कहलावे,
कान्हङदे ले साथ मुगलां नें धूङ चटावे !

मिळ मरूधरा रा सिंग तुरकङा मार भगावे,
पांच बरस रे मांय मुगलीया मर खप जावे !

फिर फिर लावे फौज गढ़ जाळोर ढावण री चावे,
कान्हङ, सातळदेव, विरम  घमसाण मचावे !

जून तेरासो दस खिलजी जद खुद चढ़ आवे,
खिलजी जबर लगावे जोर सिवाणा घेरों लगावे !

केई सालां करीयो पङाव गढ़ में घुस ना पावे,
कपटी किनो कपट पाणी ने मीदम बणावे !

किले जळ भण्डार गऊ रो रगत मिळावे,
लिनो गढ़ सिवाणों घेर बारे कोई जा नहीं पावे !

जळ में गाय रो रगत पाणी कोई कयां पिवे,
जद सांतळ करी हूंकार हाका रो एलान करावे !

जलम भौम रे काज मरण रा मंगळ गावे,
सांतळ संग राठौङ रण में रजपूती दिखावे !

मारिया  मुगल अनेक आखिर रणखेत रेजावे,
गढ़ मचीयो रूदन जद जोर जौहर री चिता सजावे !

धिन धण सूरां री आज अगन में सिनान करावे,
गढ़ सिवाणो जीत खिलजी ओ एेलान करावे !

गढ़ घेरों जाळोर काफिर कोई बच नहीं पावे,
मुगल सेना मिळ जोर मारकाट हद मचावे !

गढ़ पहुंची जाळोर जैमिन्दर खण्डीत करवावे,
काना सुणीयो कान्हङ देव मुगलां रा गोडा टेकावे !

कर कपट कमालुदीन विशाळ सेना संग आवे,
गढ़ घेर लिनो जाळोर किला रे घेरों लगावे !

केई दिन किनो जोर गढ़ वो बङ नहीं पावे,
किनो घात विस्वास विको मुगलां मिळ जावे !

कान्हङ सूं वे नाराज तुरकां ने गुपत द्वार बतावे,
वीका रमणी विरांगना सहन तब कर ना पावे !

छतराणी दियो पति ने जहर हाथां विधवा बण जावे,
विक्रम संवत तेरह सौ अङसठ विरम नें राजा बणावे !

कान्हङ कियो विचार मुगलां सूं समर हो जावे,
खोल्या गढ़ किंवाङ रण में झूंझण जावे !

कान्हङ जबरो जोर मुगल मार हरषावे,
विरमदेव सो वीर मुगलां सुं लोङो लेवे !

हां छतरी वंश रा बीज सेना ने जोश बंधावे,
कर कर हिन्दू धरम ने याद वीर शमशीर चलावे !

मरणो मंगळ जाण जोधा जद जुंझार कहावे,
जुझीयां जबरा जोर अंत रणखेत रह जावे,
सनावर फिरोजां री धाय धङ सूं शीश मंगावे !

कर सुगन्धि लेप शीश नें जद दिल्ली
पहुचावे,
सजा शिश सोने रे थाळ फिरोजां पेश करावे !

कर मन ने उदास फिरोजा निरखणी चावे,
पङत फिरोजां निजर शिश पाछो फिर जावे !

कर मन में संताप फिरोजां विरम ने भतळावे,
दे दे दुहाई आज वीर ने फिरोजां यूं समझावे !

पूरब जलम री परीत सूरा विरम ने याद दिलावे,
शीश सूरा रो अटल अड़ीग पाछो फेर ना पावे !

दोहा:- तज तुरकाणी चाल,
                      हिन्दुआणी हुई हमे,
भो भो रा भरतार,
               शीश ना धूण रे सोनीगरा !

धिन धिन धरती रा लाल विरमदेव नाम कहावे,
मरूधरा रो पूत फिरोजां दाह संस्कार करावे !

दिनो हाथां दाग फिरोजां मन दुखङो ना मावे,
विरह अगन री झाळ तुरकणी सह नहीं पावे !
क्षत्राणियां सूरा जिणीया धिन मरूधर देश कहावे !!

लेखक- कवि रावजी

ईब आया

एक बै एक छोरा भाज्या
भाज्या आया अर एक बूढे त
बोल्या
छोरा - ताऊ तेरे दाँत सैं?
ताऊ - ना बेटा मेरे तो कोनी..
के बात?
छोरा - ओहोहो ठीक स ताऊ
ले फेर ये मेरे
भूंगड़े पकड़ ले.. मै ईब आया।

Tuesday, 7 June 2016

जलती रही जौहर में नारियॉ

जलती रही जौहर में नारियॉं
भेड़िये फिर भी मौन थे.!
हमे पढ़ाया अकबर महान
तो फिर 'महाराणा' कौन थे.?
क्या वो नहीं महान जो बड़ी-२
सेनाओं पर चढ़ जाता था.!
या फिर वो महान था जो सपने
में प्रताप को देख डर जाता था.!!
रणभूमि में जिनके हौसले
दुश्मनों पर भारी पड़ते थे.!
ये वो भूमि है जहॉ पर नरमुण्ड
घण्टो तक लड़ते थे.!!
रानियों का सौन्दर्य सुनकर
वो वहसी कई बार यहाँ आए.!
धन्य थी वो स्त्रियाँ,जिनकी
अस्थियाँ तक छू नहीं पाए.!!
अपने सिंहो को वो सिंहनिया
फौलाद बना देती थी.!
जरुरत जब पड़ती,काटकर
शीश थाल सजा देती थी.!!
पराजय जिनको कभी सपने
में भी स्वीकार नही थी.!
अपने प्राणों को मोह करे,वो
पीढी इतनी गद्धार नहीं थी.!!
वो दुश्मनों को पकड़कर
निचोड़ दिया करते थे.!
पर उनकी बेगमों को भी
माँ कहकर छोड़ देते थे.!!
तो सुनो यारों एेसे वहशी
दरिन्दो का जाप मत करो.!
वीर सपूतों को बदनाम करने
का पाप अब मत करो.!!

Monday, 6 June 2016

शिवलिंग बणायो है

थे मुहंगा मोती चुण
                  हार बणायो है ।
बातां री सखरी पालिस
                  सूं चमकायो है ।
पण सुण चतर चुगल
                  सुजान भायला !,
म्हे दसकूंटै भाठै सूं
               शिवलिंग बणायो है ।
      
             

खेत री ढाणी

रामुड़ै रै
खेत री ढाणी बल़गी  ।
बो रोवै हो
गिड़गिड़ावै हो
नेताजी रै आगै   ।
कै म्हारै जरुरी
काम रो सामान
सगल़ौ ई बल़ग्यो  ।
नेताजी
गोर सूं देखै हा
कै ओ आपणै
जरुरी काम रो
सामान है, कै कोनी ।

         

Saturday, 28 May 2016

ई ल्यो

ई ल्यो....

बिमारी हो रही थी ब्रेड से और लोग समझ रहे थे कि तम्बाकू और दारु से हो रही है

___वीरांगना क्षत्राणीयों के पराक्रम के विषय में

___वीरांगना क्षत्राणीयों के पराक्रम के विषय में

राजपूतों की वीरता की बातें तो सारी दुनिया करती है। बाप्पा रावल ,खुमाण,हमीर कुम्भा ,राणा सांगा , महाराणा प्रताप,शिवाजी ,चंद्रसेन ,पृथ्वीराज चौहान ,गोरा-बादल,जयमल-फत्ता ,कल्लाजी , वीर दुर्गादास ,अमर सिंह राठोड़ ,छत्रसाल ,बंदा बैरागी जैसे अनगिनत नाम हैं जिनकी वीरता और बलिदानको विश्व नमन करता है पर ऐसे सिंहों को जन्म देने वाली सिंहनियों की महिमा अतुल्य है। पद्मिनी ,रानी कर्मावती ,राणी भटियाणी ,जीजाबाई, हाड़ी राणी ,पन्ना ,दुर्गावती, झाँसी की रानी आदि के त्याग और बलिदान का स्थान इनसे भी कहीं ऊपर है. धन्य हैं वे राजपूत स्त्रियां जिन्होंने अपना सर काट कर पति को मोह छोड़ रणभूमि में मरने को उद्यत किया ,धन्य हैं वो माएँ जिन्होंने त्याग और बलिदान के ऐसे संस्कार राजपुत्रों में जन्म से ही सिंचित किए।

चारण कवि वीर रसावतार सूर्यमल्ल मीसण ने "वीर सतसई "में ऐसी ही वीरांगनाओं की कोटि कोटि बलिहारी जाते हुए कहा है।
हूँ बलिहारी राणियां ,थाल बजाने दीह
बींद जमीं रा जे जणे ,सांकळ हीठा सीह।
(मैं उन राजपूत माताओं की बलिहारी हूँ जिन्होंने सिंह के समान धरती के स्वामी राजपूत सिंहों को जन्म दिया. )

बेटा दूध उजाळियो ,तू कट पड़ियो जुद्ध।
नीर न आवै मो नयन ,पण थन आवै दूध।
( माँ कहती है बेटे तू मेरे दूध को मत लजाना ,युद्ध में पीठ मत दिखाना ,वीर की तरह मरना तेरे बलिदान पर मेरे आँखोंमें अश्रु नहीं पर हर्ष से मेरे स्तनों में दूध उमड़ेगा)

गिध्धणि और निःशंक भख ,जम्बुक राह म जाह।
पण धन रो किम पेखही ,नयन बिनठ्ठा नाह ।
( युद्ध में घायल पति के अंगों को गिद्ध खा रहे हैं ,इस पर वीर पत्नी गिध्धणी से कहती है ,तू और सब अंग खाना पर मेरे पति के चक्षु छोड़ देना ताकि वो मुझे चिता पर चढ़ते देख सकें. )

इला न देणी आपणी ,हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालनैं ,मरण बड़ाई माय।
(बेटे को झूला झुलाते हुए वीर माता कहती है पुत्र अपनी धरती जीते जी किसी को मत देना ,इस प्रकार वह बचपन की लोरी में ही वीरता पूर्वक मरने का महत्त्व पुत्र को समझा देती है। )हिंद की राजपुतानीया ***

यह रचना हिंदी, गुजराती, चारणी भाषा मे है, जिसमे हिंदुस्तान की राजराणी व क्षत्रियाणी का चित्र है, उसका वर्तन, रहेणीकहेणी, राजकाज मे भाग, बाल-उछेर और शुद्धता का आदर्श है. उसका स्वमान, उसकी देशदाझ, रण मे पुत्र की मृत्यु की खबर सुन वो गीत गाती है, पुत्र प्रेम के आवेश मे उसे आंसु नही आते, लेकिन जब पुत्र रण से भागकर आता है तो उसे अपना जिवन कडवा जहर लगने लगता है, उसका आतिथ्य, गलत राह पर चडे पति के प्रति तिरस्कार, रण मे जा रहा पति स्त्रीमोह मे पीछे हटे तो शीष काटकर पति के गले मे खुद गांठ बांध देती है. फिर किसके मोह मे राजपुत वापिस आये?

उसके धावण से गीता झरती है, उसके हालरडे मे रामायण गुंझती है, भय जैसा शब्द उसके शब्द कोश मे नही है. उसका कूटुंबवात्सल्य., सास-ससुर और जेठ के प्रति पूज्य भाव, दास-दासी पर माता जैसा हेत लेकिन बाहर से कठोर, पति की रणमरण की बात सुन रोती नही अपितु घायल फौज के अग्र हो रणहांक गजाती है. एसी आर्यवर्त की राजपुतानी भोगनी नही, जोगनी है. राजपुतो मे आज एसी राजपुतानीयो के अभाव से काफी खोट पड गयी है...इसी बात का विवरण इस रचना मे है...

अरि फौज चडे, रणहाक पडे,
रजपुत चडे राजधानियां का,
तलवार वडे सनमुख लडे,
केते शीश दडेय जुवानियां का,
रण पुत मरे, मुख गान करे,
पय थान भरे अभिमानियां का,
बेटा जुद्ध तजे, सुणी प्राण तजे,
सोई जीवन राजपुतानियां का.....

रण तात मरे, सुत भ्रात मरे,
निज नाथ मरे, नही रोवती थी,
सब घायल फोज को एक करी,
तलवार धरी रण झुझती थी,
समशेर झडी शिर जिलती थी,
अरि फोज का पांव हठावती थी,
कवि वृंद को गीत गवावती थी,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी.....
अभियागत द्वार पे देखती वे,
निज हाथ से थाल बनावती थी,
मिजबान को भोजन भेद बिना,
निज पूत समान जिमावती थी,
सनमान करी फिर दान करी,
चित्त लोभ का लंछन मानती थी,
अपमानती थी मनमोह बडा,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी.....

रण काज बडे, रजपुत चडे,
और द्वार खडे मन सोचती थी,
मेरा मोह बडा, ईसी काज खडा,
फिर शीश दडा जिमी काटती थी,
मन शेश लटा सम केश पटा,
पतिदेव को हार पे'नावती थी,
जमदूतनी थीं, अबधूतनी थीं,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी.....

आज वीर कीं, धीर कीं खोट पडी,
पडी खोट उदारन दानियां कीं,
प्रजापाल दयाल की खोट पडीं,
पडी खोट दीसे मतिवानियां कीं,
गीता ज्ञान कीं, ध्यान कीं खोट पडीं,
पडी खोट महा राजधानियां कीं,
सब खोट का कारन 'काग' कहे,
पडी खोट वे राजपूतानियां कीं.....

साभार - कवि दुला भाया 'काग'

Thursday, 26 May 2016

ऐ राठौड़  कयामे आवे ?

मै काल जोधपुर जावे हो जद मेरे साथ आली सीट पर बेठयो भाई पूछे।
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के जात ह भाईजी ?
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मे केयो राठौड़.

फेर केवे भाईजी ऐ राठौड़  कयामे आवे ?
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मे केओ भाया रूपया होवे जद तो फॉर्च्यूनर में आवे
नही तो बस मे आवे !

पईसां लारे गेला होग्या।

----मारवाड़ी भाषा का आनंद--

भाईचारो मरतो दीखे,
पईसां लारे गेला
होग्या।
घर सुं भाग गुरुजी बणग्या,
चोर उचक्का चेला होग्या,
चंदो खार कार में घुमे,
भगत मोकळा भेळा होग्या।
कम्प्यूटर को आयो जमानो,
पढ़ लिख ढ़ोलीघोड़ा होग्या,
पढ़ी-लिखी लुगायां ल्याया
काम करण रा फोङा होग्या ।
घर-घर गाड़ी-घोड़ा होग्या,
जेब-जेब मोबाईल होग्या।
छोरयां तो हूंती आई पण
आज पराया छोरा होग्या,
राल्यां तो उघड़बा लागी,
न्यारा-न्यारा डोरा होग्या।
इतिहासां में गयो घूंघटो,
पाऊडर पुतिया मूंडा होग्या,
झरोखां री जाल्यां टूटी,
म्हेल पुराणां टूंढ़ा होग्या।
भारी-भारी बस्ता होग्या,
टाबर टींगर हळका होग्या,
मोठ बाजरी ने कुण पूछे,
पतळा-पतळा फलका होग्या।
रूंख भाडकर ठूंठ लेयग्या
जंगळ सब मैदान होयग्या,
नाडी नदियां री छाती पर
बंगला आलीशान होयग्या।
मायड़भाषा ने भूल गया,
अंगरेजी का दास होयग्या,
टांग कका की आवे कोनी
ऐमे बी.ए. पास होयग्या।
सत संगत व्यापार होयग्यो,
बिकाऊ भगवान होयग्या,
आदमी रा नाम बदलता आया,
देवी देवता रा नाम बदल लाग्या
भगवा भेष ब्याज रो धंधो,
धरम बेच धनवान होयग्या।
ओल्ड बोल्ड मां बाप होयग्या,
सासु सुसरा चौखा होग्या,
सेवा रा सपनां देख्या पण
आंख खुली तो धोखा होग्या।
बिना मूँछ रा मरद होयग्या,
लुगायां रा राज होयग्या,
दूध बेचकर दारू ल्यावे,
बरबादी रा साज होयग्या।
तीजे दिन तलाक होयग्यों,
लाडो लाडी न्यारा होग्या,
कांकण डोरां खुलियां पेली
परण्या बींद कंवारा होग्या।
बिना रूत रा बेंगण होग्या,
सियाळा में आम्बा होग्या,
इंजेक्शन सूं गोळ तरबूज
फूल-फूल कर लम्बा हो गया
दिवलो करे उजास जगत में
खुद रे तळे अंधेरा होग्या।
मन मरजी रा भाव होयग्या,
पंसेरी रा पाव होयग्या,
ओ थाने चोखो लाग्यो हुव तो औरा ना भी भेजनो  मति भुलज्यो।