Friday, 30 October 2015

हर कोई भरे बटका

हर कोई भरे बटका

घूमावा नहीं ले जावो,
तो घरवाळी भरे बटका |

घरवाळी रो ज्यादा ध्यान राखो,
तो माँ भरे बटका |

कई काम कमाई नी करो,
तो बाप भरे बटका |

पैईसा टक्का ना दो,
तो टाबर भरे बटका |

कई खरचो नी करो,
तो दोस्त भरे बटका |

थोड़ोक कई , केई दो,
तो पड़ौसी भरे बटका |

पंचायती में नी जावो,
तो समाज भरे बटका |

जनम मरण में नी जावो,
तो सगा संबंधी भरे बटका |

छोरा छोरी  पढ़े नहीं
तो मास्टर भरे बटका |

पूरी फीस नी दो ,
तो डाक्टर भरे बटका |

साधन रा कागज ना तो',
तो पुलिस भरे बटका |

मांगी रिश्वत ना दो,
तो साब भरे बटका |

चावता वोट ना दो,
तो नेता भरे बटका |

टेमसु उधार ना चुकाओ,
तो सेठ भरे बटका |

टाईमु टाईम किश्ता नी जमा करावो,
तो बैंक मैनेजर भरे बटका |

नौकरी बराबर नी करो,
तो बोस भरे बटका |

अबे आपई वताओ,
जार कठे जावा,

अठे हर कोई भरे बटका |
अठे हर कोई भरे बटका | |

Tuesday, 27 October 2015

म्हारी एैडी़  मान्यता हैं

लारला कैइ दिन, इण बात रो  बि़चार करण में निकळ गया के  समाज री, देस री, अर दुनिया री, सेवा करण सांरू निकळया मिनख आपस में क्यूं लडै़ ? इण रो कारण कांइ हैं के व्है सगळा एकण साथे रैय ने व्है आप रे समाज री, देस री अर दुनिया री सेवा नी कर सके ? इण रा मोकळा कारण व्है सके ।पण म्हने एडो लखावे के इण रो एक कारण सेवा रे नाम माथै, खुद रे अैंकार (अंहकार) ने तिरपत करणो हैं । आप इण दीठ सूं विचार करावो के  लगै टगै सगळा मिनखां ने खुद री न्यारी ओलखाण राखण री तगडी़ भूख व्है ।इण भूख ने तिरपत करण रे वास्ते लोग तरै तरै रा जतन करै ।कोइ घणा रूपिया कमावे, कोइ बिणज वोपार करे, कोइ राज रो मोटो अहलकार बणै इण भांत विण रे रूपिया री भूख तिरपत व्है ।पण अैंकार रा कैइ रूप व्है, अर घणा झीणा व्है पकड़ में आवै कोनी ।जद रूपिया घणा व्है जावै अर ओहदो ऊचों व्है जावै तद प्रतिष्ठा री भूख जाग जावै । प्रतिष्ठा री भूख पइसा (पैसा) री भूख सूं घणी तकडी़ व्है ।इण ने तिरपत करण खातिर मिनख घणी जुगत अर जनम करे ।कोइ सराय धरम शाळ बणाय आप रो नाम मोटा आखरां में लिखावे, तो कोइ किणी री अबखी वैळा में मदद करै ।कोइ आप रा संगठण बणाय लोगां री दिन रात सेवा करण सांरू निकळ जावै ।इण भांत जद लोगां रा काम निकळै जद लोग इणां ने भर भर मूंडा ने घणी आशीष दैवे ।अर इण लोगां ने खुद ने ही एडौ़ इज लखावे के सांचाणी व्है समाज री सेवा इज कर रह्या हैं इण भांत जद प्रतिष्ठा में जद बाधैपो घणो व्है जावै तद इणां री भूख में इण सूं सवायो बाधैपो व्है जावै  । अबै इणां ने आप री बात सबसूं सिरै लागै, अर खुद रो काम सगळा सूं ऊचों दिखै ।इण भांत मिनख में आप रे अनुयायां री भूख जागै विण ने अैडा़ मिनख घणा सुहावै जका आंखिया मीच ने बात माने, मोडा़ बैगा ऐडा़ मिनख मोकळा आंने मिळ जावै, जका इयांरा जै  जै कार करे ।इण भांत भीतर में भरियो अैंकार पतिजै अर आदमी खुद ने सेवा करण वाळो समझण लाग जावै । पण जद कोइ दूजो मिनख इणीज भांत रा काम करण लागै तद इण रा अैंहकार माथै चोट पडै, दूजा मिनख री तारीफ  सहन कोनी व्है  । काळजा  में लाय लाग जावै, हीये में धपळका  उठे  के  म्हारे जैडो़  दूजो कुण ।जद विण ने रोकण रा जतन करै ।इण में साथे रैवण वाळा चेला चांटी बळती लाय में पूळा नाखण रो काम करे ।इण में जद नवो पख हार मान आपरो रस्तो बदळ दैवे तद तो ठीक हैं ।पण जद दोनूं पख सेवा रे नाम माथै खुद रे मायला अैंहकार ने पोखण वाळा व्है जद भिड़न्त टळै कोनी ।अर देस रा, समाज रा, दळ रा अर संगठण रा दोय फाड़ व्है जावै ।इण सूं सबसूं मोटो नुकसान ओ व्है के  समाज रा चावा  ठावा अर नेम धरम सूं चालण वाळा, रीत री अर नीती री बात करण वाळा लारलै छैडै़ जावै परा अर कांनो करलै अर समाज में ओछी सोच रा अर लड़ण भिड़ण वाळा आगे आ जावै अर वां री चार आंनी चालण लागै । म्हारो मानणो हैं  के सेवा तो अैक  स्वभाव हैं जिण रो कारण हीये री पीड़ हैं ,विदको किणी री मदद कर सकूं, किणी रे काम आय सकूं,  आ सोच राखण वाळो ही सेवा कर सके, अर विण रो किणी रे साथे झगडो़ नी व्है सके  म्हारी एैडी़  मान्यता हैं ।   

Monday, 26 October 2015

हिंदी बोलेंगे,

एक बार गांव के स्कूल में नये
मास्टर ने कहा आज से सब
हिंदी बोलेंगे,,,
थोडी देर बाद में पिछे से
आवाज आयी
"सरजी "रामुडा लारे से डुका मार रहा हे"

राठोड़ राजपूतो - की उत्तपति

||जय माँ नागणेच्या री ||
आज हम आप सब को राठौड़ राजपूतो के वारे मे
परिचय करा रहे हैं, आशा हैं आपको पोस्ट पसन्द आयेगी

राठोड़ राजपूतो - की उत्तपति सूर्यवंशी राजा के
राठ (रीढ़) से उत्तपन बालक से हुई है इस लिए ये राठोड कहलाये,
राठोरो की वंशावली मे
उनकी राजधानी कर्नाट और कन्नोज बतलाई गयी है!
राठोड सेतराग जी के पुत्र राव सीहा जी थे!
मारवाड़ के राठोड़ उन ही के वंशज है! राव सीहा जी ने करीब
700 वर्ष पूर्व द्वारिका यात्रा के दोरान मारवाड़ मे आये और
राठोड वंश की नीव रखी! राव सीहा जी राठोरो के आदि
पुरुष थे !
अर्वाचीन राठोड शाखाएँ खेडेचा, महेचा , बाडमेरा , जोधा ,
मंडला , धांधल ,
बदावत , बणीरोत , चांदावत , दुदावत , मेड़तिया ,
चापावत , उदावत , कुम्पावत , जेतावत , करमसोत बड़ा ,
करमसोत छोटा , हल सुन्डिया , पत्तावत , भादावत , पोथल ,
सांडावत , बाढेल , कोटेचा , जैतमालोत , खोखर , वानर ,
वासेचा , सुडावत , गोगादे , पुनावत , सतावत , चाचकिया ,
परावत , चुंडावत , देवराज , रायपालोत , भारमलोत , बाला ,
कल्लावत , पोकरना . गायनेचा , शोभायत , करनोत ,पपलिया ,
कोटडिया , डोडिया , गहरवार , बुंदेला ,
रकेवार , बढ़वाल , हतुंधिया , कन्नोजिया , सींथल , ऊहड़ ,
धुहडिया , दनेश्वरा , बीकावत , भादावत ,बिदावत आदि……
राठोड वंश
Vansh – Suryavanshi
वेद – यजुर्वेद
शाखा – दानेसरा
गोत्र – कश्यप
गुरु – शुक्राचार्य
देवी – नाग्नेचिया
पर्वत – मरुपात
नगारा – विरद रंणबंका
हाथी – मुकना
घोड़ा – पिला (सावकर्ण/श्यामकर्ण)
घटा – तोप तम्बू
झंडा – गगनचुम्बी
साडी – नीम की
तलवार – रण कँगण
ईष्ट – शिव का
तोप – द्न्कालु
धनुष – वान्सरी
निकाश – शोणितपुर (दानापुर)
बास – कासी, कन्नोज, कांगडा राज्य, शोणितपुर,
त्रिपुरा, पाली, मंडोवर, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़,
इडर, हिम्मतनगर, रतलाम, रुलाना, सीतामऊ, झाबुबा,
कुशलगढ़, बागली, जिला-मालासी,
अजमेरा आदि ठिकाना दानसेरा शाखा का है
दारु मीठी दाख री, सूरां मीठी शिकार।
सेजां मीठी कामिणी, तो रण मीठी तलवार।।
व्रजदेशा चन्दन वना, मेरुपहाडा मोड़ !
गरुड़ खंगा लंका गढा, राजकुल राठौड़ !!
दारु पीवो रण चढो, राता राखो नैण।
बैरी थारा जल मरे, सुख पावे ला सैण॥

पंद्रह का पहाड़ा बोलो

एक बार सीबीएसई स्कूल रा एक बेन जी गाँव री स्कूल में पढ़ावण नै गिया। कक्षा में
पपिया नै उबौ कर नै कियो - "Speak the table of fifteen."
पपियो - कई केवो सा?
बेन जी - अरे पंद्रह का पहाड़ा बोलो।
पपियो - अमार बोलूँ सा..

पन्दरे एका पन्दरे
पन्दर दूणा ती
ती पैंताला
चौका सांठ
पाणया पिचोत्तर
छकड़ा नब्बे
सातू पिचड़ोतड़
अंटू बी'आ
नम पैतीया
ढबाक डेढ़ सौ !

.
.. वा बेन जी अजै तक कोमा में इज है।

Sunday, 25 October 2015

थन समझाऊँ बार हजार कालजो मत बाल

~एक बार एक गणित के अध्यापक से उसकी
पत्नी ने गणित मे प्यार के दो शब्द कहने को
कहा,
पति ने पूरी कविता लिख दी ~
म्हारी गुणनखण्ड सी नार, कालजो मत बाल
थन समझाऊँ बार हजार,
कालजो मत बाल
1. दशमलव सी आँख्या थारी,
न्यून कोण सा कान,
त्रिभुज जेडो नाक,
नाक री नथनी ने त्रिज्या जाण,
कालजो मत बाल
2. वक्र रेखा सी पलका थारी,
सरल भिन्न सा दाँत,
समषट्भुज सा मुंडा पे,
थारे मांख्या की बारात,
कालजो मत बाल
3.रेखाखण्ड सरीखी टांगा थारी,
बेलन जेडा हाथ,
मंझला कोष्ठक सा होंठा पर,
टप-टप पड रही लार,
कालजो मत बाल
4.आयत जेडी पूरी काया थारी,
जाणे ना हानि लाभ,
तू ल.स.प., मू म.स.प.,
चुप कर घन घनाभ,
कालजो मत बाल
5.थारा म्हारा गुणा स्युं.
यो फुटया म्हारा भाग ।
आरोही -अवरोही हो गयो,
मुंडे आ गिया झाग ।
कालजो मत बाल
म्हारी गुणनखण्ड सी नार कालजो मत बाल
थन समझाऊँ बार हजार कालजो मत बाल

पिली धरती पथ वाली,धन धोरा रो देश।

पिली धरती पथ वाली,धन धोरा रो देश।
अमर पागड़ी वीर री,कैसर बारनो बेस।
जरणी जाया नाहर सम,ऐडा वीर सपूत।
तेजस धन या मरुधरा,धन धन या राजपूत ।।
 

Friday, 23 October 2015

लसण‬ छोलो

पति सुबह ‪#‎नहाते‬ गा रहा था
गोविंद ‪#‎बोलो‬ हरी ‪#‎गोपाल‬ बोलो
‪#‎पत्नी‬ - गोविंद #बोलो चाहे #गोपाल बोलो
साग रोटी ‪#‎खानी‬ वेतो पेला ‪#‎लसण‬ छोलो

धरी बाबा के कान के नीचे

जाट ने खेत में टयूबवेल लगवाना था !
सोचा कि बाबा जी से पूछ लू कि पानी कहां
होगा !
बाबा जी ने सारे खेत में घूम कर एक कोने में हाथ रख
दिया
और बोला कि यहां टयूबवेल लगा ले और 1100 रु. ले लिये !
जाट बेचारा भुरभुरे स्वभाव का था !
बाबा जी से बोला:-
मैं बहुत खुश हूं...
आप मेरे घर खाना खाने आओ !
बाबा ने सोचा कि फंस गई सामी आज तो... और हां कर
दी !
जाट घर जा कर जाटणी से बोला,:-"
बाबा जी जिम्मण आवेंगे पकवान बना ले और
एक कटोरी में नीचे देसी
घी और उपर बूरा घाल दिये !
जाटणी बोली कि घी तो उपर
होता है.
जाट बोला कि आज तू घी नीचे रखिये !
बाबा जी आ गये और बूरे वाली
कटोरी देख कर बोले ,:-
" जाट भाई इसमें घी तो है ही
नहीं !
जाट ने चप्पल निकाल के एक धरी बाबा के कान के
नीचे और बोला,:-
" तन्नै खेत में 250 फुट नीचे का पानी
देख लिया...
कटोरी में 2 इंच नीचे घी
नी दिक्खया

www.rajrangilo.blogspot.in

Sunday, 18 October 2015

धौरा माथै बाँध झुंपड़ो


धौरा माथै बाँध झुंपड़ो
दौन्यु रैस्या खेता में
सीट्टा मौरस्या मौरण खास्यां
खुपरी खास्यां खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

खेजड़ळी पर घाल हिंडोळो
हिंडो हिंडस्या सावण में
खाट्टा मिट्ठा खास्या बोरिया
कांकड़ वाला खेता में
मौज मनास्यां खेता मे !

लीलै धान की मीठी सौरभ
गमकै की जद खेता में
अलगोजा पर मूमळ गास्या
धौरां वाला खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

हेत प्रीत रा कांकड़ डोरड़ा
आपा खोलस्या खेता में
हाथ पकड़ कर कनै बैठस्यां
बाता करस्यां खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

साख सवाई अबके हुसी
घोटां पोटां बाजरियाँ
सिट्या तोड़स्या कड़ब काटस्या
खळो काढस्यां खेता में
मौज मनास्यां खेता

LOVE STORY-''MUMAL-MAHINDRA

LOVE STORY-''MUMAL-MAHINDRA

गुजरात का हमीर जाडेजा अपनी ससुराल अमरकोट (सिंध) आया हुआ था | उसका विवाह अमरकोट के राणा वीसलदे सोढा की पुत्री से हुआ था | राणा वीसलदे का पुत्र महिंद्रा व हमीर हमउम्र थे इसलिए दोनों में खूब जमती थी साथ खेलते,खाते,पीते,शिकार करते और मौज करते | एक दिन दोनों शिकार करते समय एक हिरण का पीछा करते करते दूर लोद्र्वा राज्य की काक नदी के पास आ पहुंचे उनका शिकार हिरण अपनी जान बचाने काक नदी में कूद गया, दोनों ने यह सोच कि बेचारे हिरण ने जल में जल शरण ली है अब उसे क्या मारना | शिकार छोड़ जैसे दोनों ने इधर उधर नजर दौड़ाई तो नदी के उस पार उन्हें एक सुन्दर बगीचा व उसमे बनी एक दुमंजिली झरोखेदार मेड़ी दिखाई दी | इस सुनसान स्थान मे इतना सुहावना स्थान देख दोनों की तबियत प्रसन्न हो गयी | अपने घोड़े नदी मे उतार दोनों ने नदी पार कर बागीचे मे प्रवेश किया इस वीरानी जगह पर इतना सुन्दर बाग़ देख दोनों आश्चर्यचकित थे कि अपने पडौस मे ऐसा नखलिस्तान ! क्योंकि अभी तक तो दोनों ने ऐसे नखलिस्तानों के बारे मे सौदागरों से ही चर्चाएँ सुनी थी |

उनकी आवाजें सुन मेड़ी मे बैठी मूमल ने झरोखे से निचे झांक कर देखा तो उसे गर्दन पर लटके लम्बे काले बाल,भौंहों तक तनी हुई मूंछे,चौड़ी छाती और मांसल भुजाओं वाले दो खुबसूरत नौजवान अपना पसीना सुखाते दिखाई दिए | मूमल ने तुरंत अपनी दासी को बुलाकर कर कहा- नीचे जा, नौकरों से कह इन सरदारों के घोड़े पकड़े व इनके रहने खाने का इंतजाम करे, दोनों किसी अच्छे राजपूत घर के लगते है शायद रास्ता भूल गए है इनकी अच्छी खातिर करा |

मूमल के आदेश से नौकरों ने दोनों के आराम के लिए व्यवस्था की,उन्हें भोजन कराया | तभी मूमल की एक सहेली ने आकर दोनों का परिचय पूछा | हमीर ने अपना व महिंद्रा का परिचय दिया और पूछा कि तुम किसकी सहेली हो ? ये सुन्दर बाग़ व झरोखेदार मेड़ी किसकी की है ? और हम किस सुलक्षीणी के मेहमान है ?
मूमल की सहेली कहने लगी- "क्या आपने मूमल का नाम नहीं सुना ? उसकी चर्चा नहीं सुनी ? मूमल जो जगप्यारी मूमल के नाम से पुरे माढ़ (जैसलमेर) देश मे प्रख्यात है | जिसके रूप से यह सारा प्रदेश महक रहा है जिसके गुणों का बखान यह काक नदी कल-कल कर गा रही है | यह झरोखेदार मेड़ी और सुन्दर बाग़ उसी मूमल का है जो अपनी सहेलियों के साथ यहाँ अकेली ही रहती है |" कह कर सहेली चली गयी |

तभी भोजन का जूंठा थाल उठाने आया नाई बताने लगा -" सरदारों आप मूमल के बारे मे क्या पूछते हो | उसके रूप और गुणों का तो कोई पार ही नहीं | वह शीशे मे अपना रूप देखती है तो शीशा टूट जाता है | श्रंगार कर बाग़ मे आती है चाँद शरमाकर बादलों मे छिप जाता है | उसकी मेड़ी की दीवारों पर कपूर और कस्तूरी का लेप किया हुआ है,रोज ओख्लियों मे कस्तूरी कुटी जाती है,मन-मन दूध से वह रोज स्नान करती है,शरीर पर चन्दन का लेप कराती है | मूमल तो इस दुनिया से अलग है भगवान् ने वैसी दूसरी नहीं बनाई |"

कहते कहते नाई बताने लगा-" अखन कुँवारी मूमल,पुरुषों से दूर अपने ही राग रंग मे डूबी रहती है | एक से एक खुबसूरत,बहादुर,गुणी,धनवान,जवान,राजा,राजकुमार मूमल से शादी करने आये पर मूमल ने तो उनकी और देखा तक नहीं उसे कोई भी पसंद नहीं आया | मूमल ने प्रण ले रखा है कि वह विवाह उसी से करेगी जो उसका दिल जीत लेगा,नहीं तो पूरी उम्र कुंवारी ही रहेगी |"

कुछ ही देर मे मूमल की सहेली ने आकर कहा कि आप दोनों मे से एक को मूमल ने बुलाया है |
हमीर ने अपने साले महेन्द्रा को जाने के लिए कहा पर महिन्द्रा ने हमीर से कहा- पहले आप |
हमीर को मेड़ी के पास छोड़ सहेली ने कहा -" आप भीतर पधारें ! मूमल आपका इंताजर कर रही है |
हमीर जैसे ही आगे चौक मे पहुंचा तो देखा आगे उसका रास्ता रोके एक शेर बैठा है और दूसरी और देखा तो उसे एक अजगर रास्ते पर बैठा दिखाई दिया | हमीर ने सोचा मूमल कोई डायन है और नखलिस्तान रचकर पुरुषों को अपने जाल मे फंसा मार देती होगी | वह तुरंत उल्टे पाँव वापस हो चौक से निकल आया |

हमीर व महिंद्रा आपसे बात करते तब तक मूमल की सहेली आ गयी और महिंद्रा से कहने लगी आप आईये मूमल आपका इंतजार कर रही है |
महिंद्रा ने अपना अंगरखा पहन हाथ मे भाला ले सहेली के पीछे पीछे चलना शुरू किया | सहेली ने उसे भी हमीर की तरह चौक मे छोड़ दिया,महिंद्रा को भी चौक मे रास्ता रोके शेर बैठा नजर आया उसने तुरंत अपना भाला लिया और शेर पर पूरे वेग से प्रहार कर दिया | शेर जमीन पर लुढ़क गया और उसकी चमड़ी मे भरा भूसा बाहर निकल आया | महिंद्रा यह देख मन ही मन मुस्कराया कि मूमल उसकी परीक्षा ले रही है | तभी उसे आगे अजगर बैठा दिखाई दिया महिंद्रा ने भूसे से भरे उस अजगर के भी अपनी तलवार के प्रहार से टुकड़े टुकड़े कर दिए | अगले चौक मे महिंद्रा को पानी भरा नजर आया,महिंद्रा ने पानी की गहराई नापने हेतु जैसे पानी मे भाला डाला तो ठक की आवाज आई महिंद्रा समझ गया कि जिसे वह पानी समझ रहा है वह कांच का फर्श है |

कांच का फर्श पार कर सीढियाँ चढ़कर महिंद्रा मूमल की मेड़ी मे प्रविष्ट हुआ आगे मूमल खड़ी थी,जिसे देखते ही महिंद्रा ठिठक गया | मूमल ऐसे लग रही थी जैसे काले बादल मे बिजली चमकी हो, एड़ी तक लम्बे काले बाल मानों काली नागिन सिर से जमीन पर लोट रही हों| चम्पे की डाल जैसी कलाइयाँ,बड़ी बड़ी सुन्दर आँखे, ऐसे लग रही थी जैसे मद भरे प्याले हो,तपे हुए कुंदन जैसा बदन का रंग,वक्ष जैसे किसी सांचे मे ढाले गए हों,पेट जैसे पीपल का पत्ता,अंग-अंग जैसे उफन रहा हो |

मूमल का यह रूप देखकर महिंद्रा के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा-" न किसी मंदिर मे ऐसी मूर्ति होगी और न किसी राजा के रणवास मे ऐसा रूप होगा |" महिंद्रा तो मूमल को ठगा सा देखता ही रहा | उसकी नजरें मूमल के चेहरे को एकटक देखते जा रही थी दूसरी और मूमल मन में कह रही थी - क्या तेज है इस नौजवान के चेहरे पर और नयन तो नयन क्या खंजर है | दोनों की नजरें आपस में ऐसे गड़ी कि हटने का नाम ही नहीं ले रही थी |

आखिर मूमल ने नजरे नीचे कर महिंद्रा का स्वागत किया दोनों ने खूब बाते की ,बातों ही बातों में दोनों एक दुसरे को कब दिल दे बैठे पता ही न चला और न ही पता चला कि कब रात ख़त्म हो गयी और कब सुबह का सूरज निकल आया |
उधर हमीर को महेन्द्रा के साथ कोई अनहोनी ना हो जाये सोच कर नींद ही नहीं आई | सुबह होते ही उसने नाई के साथ संदेशा भेज महिंद्रा को बुलवाया और चलने को कहा | महिंद्रा का मूमल को छोड़कर वापस चलने का मन तो नहीं था पर मूमल से यह कह- "मैं फिर आवुंगा मूमल, बार बार आकर तुमसे मिलूँगा |"

दोनों वहां से चल दिए हमीर गुजरात अपने वतन रवाना हुआ और महिंद्रा अपने राज्य अमरकोट |मूमल से वापस आकर मिलने का वायदा कर महिन्द्रा अमरकोट के लिए रवाना तो हो गया पर पूरे रास्ते उसे मूमल के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं दे रहा था वह तो सिर्फ यही गुनगुनाता चला जा रहा था -

म्हारी माढेची ए मूमल , हाले नी अमराणे देस |
" मेरी मांढ देश की मूमल, आओ मेरे साथ अमरकोट चलो |"

महेन्द्रा अमरकोट पहुँच वहां उसका दिन तो किसी तरह कट जाता पर शाम होते ही उसे मूमल ही मूमल नजर आने लगती वह जितना अपने मन को समझाने की कोशिश करता उतनी ही मूमल की यादें और बढ़ जाती | वह तो यही सोचता कि कैसे लोद्र्वे पहुँच कर मूमल से मिला जाय | आखिर उसे सुझा कि अपने ऊँटो के टोले में एसा ऊंट खोजा जाय जो रातों रात लोद्र्वे जाकर सुबह होते ही वापस अमरकोट आ सके |

उसने अपने रायका रामू (ऊंट चराने वाले) को बुलाकर पूछा तो रामू रायका ने बताया कि उसके टोले में एक चीतल नाम का ऊंट है जो बहुत तेज दौड़ता है और वह उसे आसानी से रात को लोद्र्वे ले जाकर वापस सुबह होने से पहले ला सकता है | फिर क्या था रामू रायका रोज शाम को चीतल ऊंट को सजाकर महेन्द्रा के पास ले आता और महेन्द्रा चीतल पर सवार हो एड लगा लोद्र्वा मूमल के पास जा पहुँचता | तीसरे प्रहार महेन्द्रा फिर चीतल पर चढ़ता और सुबह होने से पहले अमरकोट आ पहुँचता |

महेन्द्रा विवाहित था उसके सात पत्नियाँ थी | मूमल के पास से वापस आने पर वह सबसे छोटी पत्नी के पास आकर सो जाता इस तरह कोई सात आठ महीनों तक उसकी यही दिनचर्या चलती रही इन महीनों में वह बाकी पत्नियों से तो मिला तक नहीं इसलिए वे सभी सबसे छोटी बहु से ईर्ष्या करनी लगी और एक दिन जाकर इस बात पर उन्होंने अपनी सास से जाकर शिकायत की | सास ने छोटी बहु को समझाया कि बाकी पत्नियों को भी महिंद्रा ब्याह कर लाया है उनका भी उस पर हक़ बनता है इसलिए महिंद्रा को उनके पास जाने से मत रोका कर | तब महिंद्रा की छोटी पत्नी ने अपनी सास को बताया कि महिंद्रा तो उसके पास रोज सुबह होने से पहले आता है और आते ही सो जाता है उसे भी उससे बात किये कोई सात आठ महीने हो गए | वह कब कहाँ जाते है,कैसे जाते है,क्यों जाते है मुझे कुछ भी मालूम नहीं |

छोटी बहु की बाते सुन महिंद्रा की माँ को शक हुवा और उसने यह बात अपनी पति राणा वीसलदे को बताई | चतुर वीसलदे ने छोटी बहु से पूछा कि जब महिंद्रा आता है तो उसमे क्या कुछ ख़ास नजर आता है | छोटी बहु ने बताया कि जब रात के आखिरी प्रहर महिंद्रा आता है तो उसके बाल गीले होते है जिनमे से पानी टपक रहा होता है |

चतुर वीसलदे ने बहु को हिदायत दी कि आज उसके बालों के नीचे कटोरा रख उसके भीगे बालों से टपके पानी को इक्कठा कर मेरे पास लाना | बहु ने यही किया और कटोरे में एकत्र पानी वीसलदे के सामने हाजिर किया | वीसलदे ने पानी चख कर कहा- " यह तो काक नदी का पानी है इसका मतलब महिंद्रा जरुर मूमल की मेंड़ी में उसके पास जाता होगा |

महिंद्रा की सातों पत्नियों को तो मूमल का नाम सुनकर जैसे आग लग गयी | उन्होंने आपस में सलाह कर ये पता लगाया कि महेन्द्रा वहां जाता कैसे है | जब उन्हें पता चला कि महेन्द्रा चीतल नाम के ऊंट पर सवार हो मूमल के पास जाता है तो दुसरे दिन उन्होंने चीतल ऊंट के पैर तुड़वा दिए ताकि उसके बिना महिंद्रा मूमल के पास ना जाने पाए |

रात होते ही जब रामू राइका चीतल लेकर नहीं आया तो महिंद्रा उसके घर गया वहां उसे पता चला कि चीतल के तो उसकी पत्नियों ने पैर तुड़वा दिए है तब उसने रामू से चीतल जैसा दूसरा ऊंट माँगा |
रामू ने कहा -" उसके टोले में एक तेज दौड़ने वाली एक टोरडी (छोटी ऊंटनी) है तो सही पर कम उम्र होने के चलते वह चीतल जैसी सुलझी हुई व अनुभवी नहीं है | आप उसे ले जाये पर ध्यान रहे उसके आगे चाबुक ऊँचा ना करे,चाबुक ऊँचा करते ही वह चमक जाती है और जिधर उसका मुंह होता उधर ही दौड़ना शुरू कर देती है तब उसे रोकना बहुत मुश्किल है |

महिंद्रा टोरडी पर सवार हो लोद्र्वा के लिए रवाना होने लगा पर मूमल से मिलने की बैचेनी के चलते वह भूल गया कि चाबुक ऊँचा नहीं करना है और चाबुक ऊँचा करते ही टोरडी ने एड लगायी और सरपट भागने लगी अँधेरी रात में महिंद्रा को रास्ता भी नहीं पता चला कि वह कहाँ पहुँच गया थोड़ी देर में महिंद्रा को एक झोंपड़े में दिया जलता नजर आया वहां जाकर उसने उस क्षेत्र के बारे में पूछा तो पता चला कि वह लोद्र्वा की जगह बाढ़मेर पहुँच चूका है | रास्ता पूछ जब महिंद्रा लोद्र्वा पहुंचा तब तक रात का तीसरा प्रहर बीत चूका था | मूमल उसका इंतजार कर सो चुकी थी उसकी मेंड़ी में दिया जल रहा था | उस दिन मूमल की बहन सुमल भी मेंड़ी में आई थी दोनों की बाते करते करते आँख लग गयी थी | सहेलियों के साथ दोनों बहनों ने देर रात तक खेल खेले थे सुमल ने खेल में पुरुषों के कपडे पहन पुरुष का अभिनय किया था | और वह बातें करती करती पुरुष के कपड़ों में ही मूमल के पलंग पर उसके साथ सो गयी |

महिंद्रा मूमल की मेंड़ी पहुंचा सीढियाँ चढ़ जैसे ही मूमल के कक्ष में घुसा और देखा कि मूमल तो किसी पुरुष के साथ सो रही है | यह दृश्य देखते ही महिंद्रा को तो लगा जैसे उसे एक साथ हजारों बिच्छुओं ने काट खाया हो | उसके हाथ में पकड़ा चाबुक वही गिर पड़ा और वह जिन पैरों से आया था उन्ही से चुपचाप बिना किसी को कुछ कहे वापस अमरकोट लौट आया | वह मन ही मन सोचता रहा कि जिस मूमल के लिए मैं प्राण तक न्योछावर करने के लिए तैयार था वह मूमल ऐसी निकली | जिसके लिए मैं कोसों दूर से आया हूँ वह पर पुरुष के साथ सोयी मिलेगी | धिक्कार है ऐसी औरत पर |
सुबह आँख खुलते ही मूमल की नजर जैसे महिंद्रा के हाथ से छूटे चाबुक पर पड़ी वह समझ गयी कि महेन्द्रा आया था पर शायद किसी बात से नाराज होकर चला गया |उसके दिमाग में कई कल्पनाएँ आती रही |
कई दिनों तक मूमल महिंद्रा का इंतजार करती रही कि वो आएगा और जब आएगा तो सारी गलतफहमियां दूर हो जाएँगी | पर महिंद्रा नहीं आया | मूमल उसके वियोग में फीकी पड़ गई उसने श्रंगार करना छोड़ दिया |खना पीना भी छोड़ दिया उसकी कंचन जैसी काया काली पड़ने लगी | उसने महिंद्रा को कई चिट्ठियां लिखी पर महिंद्रा की पत्नियों ने वह चिट्ठियां महिंद्रा तक पहुँचने ही नहीं दी | आखिर मूमल ने एक ढोली (गायक) को बुला महेन्द्रा के पास भेजा | पर उसे भी महिंद्रा से नहीं मिलने दिया गया | पर वह किसी तरह महेन्द्रा के महल के पास पहुँचने में कामयाब हो गया और रात पड़ते ही उस ढोली ने मांढ राग में गाना शुरू किया -

" तुम्हारे बिना,सोढा राण, यह धरती धुंधली
तेरी मूमल राणी है उदास
मूमल के बुलावे पर
असल प्रियतम महेन्द्रा अब तो घर आव |"

ढोली के द्वारा गयी मांढ सुनकर भी महिंद्रा का दिल नहीं पसीजा और उसने ढोली को कहला भेजा कि -" मूमल से कह देना न तो मैं रूप का लोभी हूँ और न ही वासना का कीड़ा | मैंने अपनी आँखों से उस रात उसका चरित्र देख लिया है जिसके साथ उसकी घनिष्ठता है उसी के साथ रहे | मेरा अब उससे कोई सम्बन्ध नहीं |"

ढोली द्वारा सारी बात सुनकर मूमल के पैरों तले की जमीन ही खिसक गई अब उसे समझ आया कि महेन्द्रा क्यों नहीं आया | मूमल ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे एसा कलंक लगेगा |
उसने तुरंत अमरकोट जाने के लिए रथ तैयार करवाया ताकि अमरकोट जाकर महिंद्रा से मिल उसका बहम दूर किया जा सके कि वह कलंकिनी नहीं है और उसके सिवाय उसका कोई नहीं |

अमरकोट में मूमल के आने व मिलने का आग्रह पाकर महिंद्रा महिंद्रा ने सोचा,शायद मूमल पवित्र है ,लगता है मुझे ही कोई ग़लतफ़हमी हो गई | और उसने मूमल को सन्देश भिजवाया कि वह उससे सुबह मिलने आएगा | मूमल को इस सन्देश से आशा बंधी |

रात को महेन्द्रा ने सोचा कि -देखें,मूमल मुझसे कितना प्यार करती है ?"'

सो सुबह उसने अपने नौकर के सिखाकर मूमल के डेरे पर भेजा | नौकर रोता-पीटता मूमल के डेरे पर पहुंचा और कहने लगा कि -"महिंद्रा जी को रात में काले नाग ने डस लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी |

नौकर के मुंह से इतना सुनते ही मूमल पछाड़ खाकर धरती पर गिर पड़ी और पड़ते ही महिंद्रा के वियोग में उसके प्राण पखेरू उड़ गए |

महेन्द्रा को जब मूमल की मृत्यु का समाचार मिला तो वह सुनकर उसी वक्त पागल हो गया और सारी उम्र " हाय म्हारी प्यारी मूमल,म्हारी प्यारी मूमल" कहता फिरता रहा |

एक और जैसलमेर के पास लोद्र्वा में काक नदी आज भी कल-कल करती मूमल और महिंद्रा की अमर प्रेम कहानी सुना रही है